डॉ. भाई और दीदी के नाम से जानते हैं लोग

धीरे-धीरे गोडबोले दंपती का जीवन अबूझमाड़ और बस्तर की पगडंडियों में ही रच-बस गया। सुबह क्लीनिक में मरीजों का उपचार और दोपहर बाद दूरस्थ गांवों तक पैदल पहुंचकर स्वास्थ्य सेवा देना उनकी दिनचर्या बन गई। आदिवासी समाज उन्हें डॉ. भाई और दीदी के नाम से पुकारने लगा।

गोडबोले दंपती ने केवल इलाज तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने कुपोषण, एनीमिया, नशामुक्ति, स्वास्थ्य जागरूकता और शिक्षा के क्षेत्र में लगातार काम किया। ग्रामीण युवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण देकर गांव स्तर पर स्वास्थ्य सहायता तैयार करने का प्रयास भी किया।

एक लाख से अधिक लोगों का किया इलाज

डॉ. रामचंद्र गोडबोले अब तक एक लाख से अधिक लोगों का इलाज कर चुके हैं। दंतेवाड़ा, नारायणपुर, बीजापुर, सुकमा और अबूझमाड़ के अनेक गांव आज भी उनके सेवा कार्यों के साक्षी हैं।

डॉ. गोडबोले बताते हैं कि जर्मनी के समाजसेवी चिकित्सक डॉ. अलबर्ट स्वाइटजर की किताब पढ़ने के बाद उनके भीतर वनवासी सेवा का संकल्प जागा था। वर्षों की तपस्या और नि:स्वार्थ सेवा को अब पद्मश्री के रूप में राष्ट्रीय सम्मान मिला है।