पौराणिक नदियों के अस्तित्व पर संकट, ‘सुदामा’ के नेतृत्व में भूख हड़ताल से तेज हुआ आंदोलन

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बस्ती। जिले की पौराणिक नदियां—मनोरमा, कुआनो और रामरेखा—आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। गाद, प्रदूषण और अतिक्रमण से बेहाल इन नदियों को बचाने की मांग को लेकर समाजसेवी चन्द्रमणि पांडे ‘सुदामा’ के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन अब भूख हड़ताल में बदल गया है। चार दिन के धरना-प्रदर्शन के बाद भी प्रशासन की ओर से ठोस पहल नहीं होने पर आंदोलनकारियों ने यह कदम उठाया है।

नदियों की दुर्दशा और तीन प्रमुख मांगें
आंदोलनकारियों का कहना है कि कभी सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था की धुरी रही ये नदियां आज प्रदूषण और उपेक्षा का शिकार हैं। उनकी मुख्य मांगों में नदियों में जल प्रवाह बहाल करना, प्रदूषण मुक्त करने की ठोस कार्ययोजना बनाना और गाद निकालकर गहराई बढ़ाना शामिल है।

पौराणिक महत्व के बावजूद उपेक्षा पर सवाल
मनोरमा नदी, जिसे ‘उद्दालक की गंगा’ कहा जाता है और जिसका संबंध रामायण कालीन घटनाओं से जोड़ा जाता है, आज नालों और गंदगी से प्रभावित है। स्थानीय लोगों के अनुसार, नदियों का जल काला पड़ चुका है, जलीय जीवन समाप्त हो रहा है और कई स्थानों पर नदी का प्रवाह लगभग खत्म हो गया है।

पांच बड़े संकटों से जूझ रहीं नदियां
नदियों की वर्तमान स्थिति में प्रदूषित जल, गाद जमाव, तटों पर अतिक्रमण, उद्गम स्थलों की उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। इन समस्याओं के कारण गर्मियों में नदियां सूख जाती हैं और बारिश में बाढ़ जैसी स्थिति बनती है।

सामाजिक तनाव का कारण भी बनी स्थिति
नदी से जुड़े विवादों के चलते हाल ही में क्षेत्र में तनाव की स्थिति भी बनी थी, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ तो यह पर्यावरण के साथ सामाजिक संतुलन के लिए भी खतरा बन सकता है।

प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
आंदोलनकारियों का आरोप है कि विभिन्न योजनाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई प्रभावी कार्य नहीं हो रहा है। सिंचाई, ग्राम्य विकास और प्रदूषण नियंत्रण विभागों के बीच समन्वय की कमी और जवाबदेही का अभाव स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

भूख हड़ताल बना अंतिम विकल्प
आंदोलनकारियों का कहना है कि ज्ञापन और प्रदर्शन के बाद जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो भूख हड़ताल ही अंतिम विकल्प बचा। उन्होंने प्रशासन से जल्द हस्तक्षेप कर समाधान निकालने की मांग की है।

आगे की राह और उम्मीद
नदियों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक योजना, पारदर्शी कार्यप्रणाली और जनभागीदारी आवश्यक है। फिलहाल सभी की नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है, जिससे यह तय होगा कि पौराणिक धरोहरों को बचाने की दिशा में कितना ठोस कदम उठाया जाता है।

बस्ती में मनोरमा, कुआनो और रामरेखा जैसी पौराणिक नदियों के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। प्रदूषण, गाद और अतिक्रमण से जूझ रहीं इन नदियों को बचाने के लिए चन्द्रमणि पांडे ‘सुदामा’ के नेतृत्व में आंदोलन भूख हड़ताल में बदल गया है। प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठते हुए अब नदी संरक्षण को लेकर ठोस कार्ययोजना और त्वरित कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।

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