नई दिल्ली/बीजिंग। ईरान और खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव के बीच चीन की मिडिल ईस्ट नीति पर नए सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, जहां चीन इस्लामिक रिपब्लिक ईरान का प्रमुख कूटनीतिक सहयोगी बना हुआ है, वहीं खाड़ी देशों में उसके बढ़ते निवेश ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए संतुलन साधने की चुनौती बढ़ा दी है।
खाड़ी देशों में चीन का निवेश तेज, अमेरिका को पीछे छोड़ा
कोविड महामारी के बाद चीन ने मिडिल ईस्ट में अपने निवेश और निर्माण परियोजनाओं में तेजी से विस्तार किया है। ऊर्जा, ग्रीन टेक्नोलॉजी और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में खाड़ी देशों की रुचि बढ़ने के साथ चीन प्रमुख निवेशक के रूप में उभरा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच चीन ने अमेरिका की तुलना में खाड़ी देशों को लगभग 2.34 गुना अधिक वित्तीय सहायता और निवेश दिया है।
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का अहम केंद्र बना क्षेत्र
मिडिल ईस्ट अब चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का प्रमुख हिस्सा बन चुका है। पिछले दो दशकों में चीन ने इस क्षेत्र में लगभग 270 अरब डॉलर के निवेश और निर्माण परियोजनाएं विकसित की हैं, जिससे वह अमेरिका के बराबर ही नहीं बल्कि कई क्षेत्रों में आगे निकल गया है।
ईरान-इजरायल तनाव से चीन की रणनीति पर खतरा
हाल ही में ईरान-इजरायल संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता ने चीन की आर्थिक योजनाओं को प्रभावित किया है। कई चीनी प्रोजेक्ट्स पर हमलों और जोखिम की स्थिति ने लगभग 4.66 अरब डॉलर की निवेश परियोजनाओं को खतरे में डाल दिया है। हालांकि बीजिंग अब भी संयम और बातचीत की नीति पर जोर दे रहा है।
खाड़ी देशों में चीन की मजबूत आर्थिक मौजूदगी
सऊदी अरब, यूएई और ओमान जैसे देशों में चीनी कंपनियां बड़े पैमाने पर ऊर्जा, सोलर प्लांट, डेटा सेंटर और बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं। चीन के लिए यह क्षेत्र तकनीकी और आर्थिक विस्तार का बड़ा केंद्र बन चुका है।
संतुलन की कूटनीति के बीच फंसा चीन
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को अब ईरान और खाड़ी देशों के बीच संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ अपने निवेश की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी। बढ़ते संघर्ष ने बीजिंग की “आर्थिक स्थिरता आधारित कूटनीति” को नई चुनौती में डाल दिया है।
