डॉक्टरों के लगातार नौकरी छोड़ने से प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत बुरी तरह से चरमरा रही है। ग्रामीण इलाकों से शहर आकर इलाज कराने वाले मरीज और उनके परिजन परेशान।
रायपुर। रायपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में गिने जाने वाले आंबेडकर अस्पताल और डीकेएस में विशेषज्ञ डॉक्टरों का टिकना अब मुश्किल होता जा रहा है। हालात यह हैं कि पिछले दो साल के भीतर ही इन दोनों बड़े अस्पतालों से करीब 100 डॉक्टरों ने अपनी नौकरी छोड़ दी है। सालों तक मरीजों की सेवा करने के बाद भी जब डॉक्टरों को नियमित नहीं किया गया, तो उन्होंने मजबूरी में सरकारी नौकरी से किनारा कर लिया।
नियमितीकरण का इंतजार और टूटता सब्र
सरकारी अस्पतालों में कई डॉक्टर लंबे समय से संविदा या अस्थायी रूप से काम कर रहे हैं। लगातार मांग और विभागीय स्तर पर पत्राचार के बाद भी जब नियमितीकरण की प्रशासनिक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी, तो डॉक्टरों में निराशा फैल गई। अस्थायी नौकरी में पदोन्नति के अवसर और नियमित सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं, जिससे डॉक्टरों को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है।
आधे से ज्यादा पद पड़े हैं खाली
डॉक्टरों के लगातार नौकरी छोड़ने से प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत बुरी तरह से चरमरा रही है। विभागीय आंकड़ों पर नजर डालें तो पूरे छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों के कुल 2058 पद स्वीकृत हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें से 1123 पद आज भी पूरी तरह से खाली पड़े हुए हैं। इसका सीधा मतलब है कि आधे से ज्यादा पदों पर कोई डॉक्टर ही नहीं है।
नौकरी पक्की ना होने के कारण टिक नहीं पा रहे
छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों की नियमित भर्तियां बेहद कम हुई हैं। पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में जहां डॉक्टरों की लगातार नियमित भर्ती की जा रही है, वहीं यहां केवल संविदा पर नियुक्तियां हो रही हैं। नौकरी पक्की न होने के कारण ही डॉक्टर यहां टिक नहीं पा रहे हैं, जबकि राज्य को अभी और ज्यादा डॉक्टरों की बहुत जरूरत है। – डॉ. राकेश गुप्ता (अध्यक्ष, एसोसिएशन हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया)
डॉक्टर सरकारी सेवा में आने को तैयार नहीं
प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों का कैडर न होने और सुविधाओं की कमी के कारण यह गंभीर स्थिति बन रही है। यही वजह है कि विभाग द्वारा कई बार इंटरव्यू आयोजित करने के बावजूद डॉक्टर सरकारी सेवा में आने को तैयार नहीं हो रहे हैं। – डॉ. हीरा सिंह लोधी, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ डॉक्टर फेडरेशन
मरीजों की बढ़ रही परेशानी
इस विभागीय सुस्ती का सबसे बड़ा खामियाजा उन गरीब मरीजों को उठाना पड़ रहा है, जो बस्तर और सरगुजा जैसे दूर-दराज के इलाकों से रायपुर आते हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण जांच विभागों के बाहर मरीजों की लंबी कतारें लगी रहती हैं और आपरेशन के लिए महीनों की तारीख मिल रही है। जो मरीज निजी अस्पतालों का भारी खर्च नहीं उठा सकते, उन्हें मजबूरी में बिना इलाज के ही वापस लौटना पड़ रहा है।
गहरा सकता है संकट पदों के खाली होने से मौजूदा डॉक्टरों पर भी काम का बोझ पहले से दोगुना हो गया है। अगर स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल प्रभाव से नियमित भर्ती के विज्ञापन जारी नहीं किए, तो आने वाले दिनों में सरकारी अस्पतालों में इलाज का यह संकट और भी गंभीर हो सकता है।
मध्य प्रदेश और निजी अस्पतालों का कर रहे रुख
अस्थायी नौकरी से परेशान होकर ये अनुभवी डॉक्टर अब तेजी से निजी अस्पतालों को ज्वाइन कर रहे हैं, जहां उन्हें बेहतर वेतन मिल रहा है। एक बड़ा रुझान यह भी है कि बड़ी संख्या में डॉक्टर छत्तीसगढ़ छोड़कर सीधे पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग द्वारा डॉक्टरों की बकायदा नियमित भर्ती की जा रही है, जिससे वहां नौकरी में पूरी सुरक्षा है।
