उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभाव-निरोधी तंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations’ ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। एक पक्ष इसे सामाजिक न्याय की दिशा में आवश्यक कदम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे विभाजनकारी बताता है। यह विवाद केवल एक प्रशासनिक नियमावली का नहीं, बल्कि भारतीय समाज में जाति, प्रतिनिधित्व और समान अवसर की अवधारणा को लेकर जारी वैचारिक संघर्ष का हिस्सा है।
पृष्ठभूमि: संस्थागत भेदभाव और न्यायिक हस्तक्षेप
उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव के मुद्दे लंबे समय से उठते रहे हैं। रोहित वेमुला की 2016 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हुई मृत्यु ने इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया। इसके बाद 2019 में मुंबई के BYL Nair Hospital में रेजिडेंट डॉक्टर पायल तड़वी की आत्महत्या ने संस्थागत वातावरण पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
इन घटनाओं के बाद न्यायिक हस्तक्षेप की मांग तेज हुई। 2012 में जारी पूर्व दिशा-निर्देशों को अपर्याप्त माना गया। 2019 में जनहित याचिका दायर की गई, जिसके बाद केंद्र सरकार और यूजीसी ने मसौदा विनियम तैयार किए। न्यायालय की प्रक्रिया के बाद जनवरी 2026 में नियमावली अधिसूचित की गई, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने अंतरिम रोक लगा दी।
यूजीसी नियमावली: संरचना और उद्देश्य
University Grants Commission द्वारा जारी नियमावली के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:
- प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में “समान अवसर केंद्र” की स्थापना
- एक “समानता समिति” का गठन
- वर्ष में दो बैठकें और छह माह में सार्वजनिक रिपोर्ट
- 24×7 हेल्पलाइन
- इक्विटी स्क्वाड और इक्विटी एम्बेसडर की नियुक्ति
- शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक
- निर्णय के विरुद्ध अपील हेतु ओम्बड्समैन की व्यवस्था
- समिति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन और महिलाओं का अनिवार्य प्रतिनिधित्व
इनका घोषित उद्देश्य उच्च शिक्षा परिसरों में समान अवसर सुनिश्चित करना और भेदभाव की शिकायतों के लिए संस्थागत तंत्र उपलब्ध कराना है।
विरोध के तर्क
नियमावली के विरोध में मुख्य तर्क यह रहा कि इससे समाज में विभाजन बढ़ेगा और शिकायतों के दुरुपयोग की आशंका रहेगी। कुछ आलोचकों का मत है कि भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट नहीं है और इससे संस्थानों में अनावश्यक विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
वहीं समर्थकों का तर्क है कि शिकायत तंत्र की अनुपस्थिति स्वयं में असमानता को स्थायी बनाती है। उनके अनुसार, शिकायत दर्ज होने की संभावना को ही “संकट” के रूप में प्रस्तुत करना संरचनात्मक असमानताओं को नकारने जैसा है।
सीमाएँ और आलोचनाएँ
नियमावली पर समर्थक पक्ष की ओर से भी कुछ महत्वपूर्ण आलोचनाएँ सामने आई हैं:
- भेदभाव की स्पष्ट और व्यापक परिभाषा का अभाव
- समिति के गठन में संस्थान प्रमुख की निर्णायक भूमिका
- आईआईटी, आईआईएम, एम्स जैसे संस्थानों पर लागू न होना
- ओम्बड्समैन की नियुक्ति में संघीय ढांचे से जुड़े प्रश्न
इन बिंदुओं पर व्यापक विमर्श की आवश्यकता बताई जा रही है।
आँकड़े और प्रतिनिधित्व का प्रश्न
यूजीसी द्वारा संसदीय समिति और न्यायालय में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित शिकायतों में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही, संकाय स्तर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व को लेकर भी चिंताएँ व्यक्त की गई हैं।
समर्थकों का कहना है कि बढ़ती शिकायतें समस्या की मौजूदगी का संकेत हैं; विरोधियों का मत है कि शिकायतों की वृद्धि संस्थागत वातावरण को अस्थिर कर सकती है।
न्यायपालिका और सामाजिक यथार्थ
जब सुप्रीम कोर्ट ऑफ India ने अंतरिम रोक लगाते हुए इन नियमों को “समाज को बांटने वाला” बताया, तो इस टिप्पणी पर भी बहस हुई। प्रश्न यह उठा कि क्या असमानताओं को संबोधित करने वाले उपाय विभाजनकारी हैं, या वे पहले से मौजूद विभाजनों को कम करने का प्रयास हैं?
यह बहस भारतीय संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय की अवधारणा की व्याख्या से भी जुड़ती है।
निष्कर्ष: बराबरी का प्रश्न अभी शेष है
यूजीसी की यह नियमावली अंतिम समाधान नहीं है। इसमें सुधार और स्पष्टता की आवश्यकता है। किंतु यह भी स्पष्ट है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर और जवाबदेह शिकायत तंत्र की आवश्यकता पर व्यापक सहमति बन रही है।
सवाल केवल इतना नहीं है कि नियमावली सही है या गलत। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज और उसके संस्थान असमानताओं को स्वीकार कर उन्हें दूर करने के लिए संरचनात्मक उपाय करने को तैयार हैं।
यदि समानता को संवैधानिक आदर्श से आगे बढ़ाकर संस्थागत व्यवहार में उतारना है, तो नियम, निगरानी और जवाबदेही की ठोस व्यवस्था अनिवार्य होगी।



