रायगढ़ लोकसभा की ताज़ा तस्वीर : पूर्व सांसदों को बंगला, मौजूदा आदिवासी सांसद राधेश्याम राठिया अब भी बेघर!

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रायगढ़, दिनांक 17 सितम्बर 2025

रायगढ़ लोकसभा की राजनीति इन दिनों एक अनोखे व्यंग्य का रूप ले चुकी है। पूर्व सांसद विष्णुदेव साय और गोमती साय को उनके कार्यकाल के दौरान रायगढ़ में सरकारी बंगले की सुविधा मिली थी। लेकिन वर्तमान सांसद राधेश्याम राठिया, जिन्हें चुने हुए एक वर्ष पूरा हो चुका है, आज भी सरकारी आवास से वंचित हैं।

यह स्थिति केवल एक सुविधा का अभाव नहीं, बल्कि आदिवासी सांसद के सम्मान और गरिमा से सीधा समझौता है।




परंपरा टूटी, सम्मान टूटा

रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र में अब तक परंपरा रही है कि सांसदों को उनके कार्यकाल में सरकारी बंगला आवंटित किया जाता रहा है।

इसी परंपरा के तहत विष्णुदेव साय और गोमती साय को आवास सुविधा दी गई।

किंतु मौजूदा सांसद राधेश्याम राठिया इस सुविधा से वंचित रह गए हैं।


जनता का कहना है कि सांसद को बंगला न मिलना उनके और जनता के बीच संवाद में भी बड़ी बाधा बन गया है। पहले लोग सीधे सांसद निवास पहुँचकर समस्याएँ रखते थे, लेकिन अब सांसद का कोई स्थायी पता ही नहीं है।




रवि भगत का फेसबुक हमला

भाजपा के पूर्व युवा नेता और भाजयुमो के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रवि भगत ने इस मामले में सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा—

> “क्या रायगढ़ लोकसभा के आदिवासी सांसद को बंगला पाने के लिए अधिकारियों की चौखट पर नाक रगड़नी पड़ेगी?”





उन्होंने भाजपा संगठन और सरकार की कथनी–करनी के अंतर पर सवाल उठाते हुए कहा कि—

अगर सांसद जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को ही ठिकाना न मिले, तो यह पूरे सिस्टम की विफलता है।

आदिवासी समाज का सम्मान मंचों पर किया जाता है, लेकिन व्यवहार में उपेक्षा साफ झलकती है।





जनता के सवाल

रायगढ़ की जनता आज खुले शब्दों में सवाल कर रही है—

“जब विष्णुदेव साय और गोमती साय को बंगला मिला, तो मौजूदा सांसद को क्यों नहीं?”

“क्या आदिवासी सांसद केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित हैं?”

“अगर सांसद का ही स्थायी पता न हो, तो जनता अपनी समस्याएँ कहाँ रखे?”


लोगों का कहना है कि यह स्थिति सांसद और जनता के बीच सीधा संवाद तोड़ रही है और जनप्रतिनिधि तक पहुँचने के लिए उन्हें गाँव–गाँव, गली–गली भटकना पड़ रहा है।




व्यंग्य के तंज़

इस प्रकरण ने राजनीतिक गलियारों में तीखे व्यंग्य को जन्म दिया है—

“पूर्व सांसदों को बंगले का सुख, मौजूदा सांसद को धूल और धक्के।”

“बीजेपी के मंच पर आदिवासी गौरव का नारा, व्यवहार में आदिवासी सांसद बेघर।”

“जहाँ नेता–अफसरों के पास आलीशान आवास हों, वहाँ सांसद का बेघर रहना लोकतंत्र पर व्यंग्य है।”

“सत्ता चैन से बैठी है, सांसद सम्मान से वंचित है।”





सिस्टम पर गंभीर सवाल

यह विवाद केवल बंगले तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक प्राथमिकताओं, राजनीतिक संवेदनशीलता और आदिवासी समाज के प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है।

अगर रायगढ़ जैसे बड़े संसदीय क्षेत्र का सांसद ही आवास सुविधा से वंचित है, तो आम जनता की स्थिति का अंदाजा लगाना कठिन नहीं।

यह तस्वीर भाजपा के आदिवासी प्रेम की सच्चाई उजागर करती है—“मंच पर आदिवासी समाज का सम्मान, व्यवहार में उनके प्रतिनिधि की उपेक्षा।”

सवाल सीधा और साफ

पूर्व सांसद विष्णुदेव साय और गोमती साय को बंगले मिले।

मौजूदा सांसद राधेश्याम राठिया को ठिकाना नहीं मिला।

जनता सवाल कर रही है, पूर्व भाजयुमो अध्यक्ष तंज़ कस रहे हैं, लेकिन सत्ता मौन है।



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