रायगढ़ त्रासदी : 108 एम्बुलेंस की रहस्यमयी गुत्थी—तीसरी मौत ने उजागर की सिस्टम की खामियां, जांच की मांग तेज!!

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रायगढ़@टक्कर न्यूज :- विजयादशमी की वह रात, जब छेत्र की सड़कें उत्सव की चमक से जगमगा रही थीं, खम्हार इलाके में एक सड़क हादसे ने न सिर्फ दो परिवारों को उजाड़ दिया, बल्कि एक रहस्यमय मौत की परतें खोलकर आपातकालीन सेवाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। दो युवकों की मौत के बाद, एक स्वस्थ व्यक्ति की एम्बुलेंस से गायब होकर घायल अवस्था में मिलना और फिर अस्पताल में दम तोड़ना—यह महज संयोग नहीं लगता। क्या यह लापरवाही है, साजिश या सिस्टम की गहरी दरार? ग्रामीणों का आक्रोश अब सड़कों से थाने तक पहुंच चुका है, और वे इस त्रासदी के असली दोषी को बेनकाब करने की मांग कर रहे हैं।



उत्सव की रात में छिपा मौत का साया: खम्हार गांव के आशीष राठिया और सरोज सवरा, दोनों युवक दशहरा मेला देखने के लिए घर से निकले थे। लेकिन खम्हार-मिरागुड़ा मार्ग पर उनकी बाइक एक खड़े वाहन से टकराई। मौके पर ही दोनों की सांसें थम गईं—एक हादसा जो सामान्य लगता, लेकिन आगे की घटनाएं इसे असामान्य बना देती हैं। सूचना मिलते ही डॉयल-112 की टीम और 108 संजीवनी एक्सप्रेस घटनास्थल पहुंची। मेले से लौटते ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई, और मृतकों के साथ गांव के ही नरेश कुमार राठिया को अटेंडर के रूप में 108 एम्बुलेंस में बिठाया गया। नरेश पूरी तरह स्वस्थ थे, उनका काम शवों को धरमजयगढ़ सिविल अस्पताल पहुंचाने में मदद करना था। लेकिन यहां से कहानी एक रहस्यपूर्ण मोड़ लेती है।

एम्बुलेंस अस्पताल पहुंची, तो अंदर सिर्फ दो शव थे। नरेश गायब। यह खबर फैलते ही अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। ग्रामीणों ने सवाल उठाया—एक स्वस्थ व्यक्ति एम्बुलेंस से कैसे लापता हो सकता है? क्या रास्ते में कोई अनहोनी हुई? 108 के चालक से जब पूछा गया, तो उनका जवाब चौंकाने वाला था: “नरेश को अटेंडर बनाकर बिठाया था, लेकिन वो अस्पताल तक नहीं पहुंचा। हमें नहीं पता वो कब उतरा। रास्ते में कोई रुकावट नहीं आई।” यह बयान और सवालों को जन्म देता है—क्या एम्बुलेंस स्टाफ की नजरअंदाजी थी, या कुछ और?



20 मिनट का रहस्य और तीसरी मौत: करीब 20 मिनट बाद, एक और ट्विस्ट। डॉयल-112 की टीम को भंवरखोल के पास मुख्य मार्ग किनारे नरेश घायल अवस्था में पड़े मिले। एएसआई एस.के. वर्मा ने बताया, “हमने उन्हें तुरंत उठाया और अस्पताल पहुंचाया, लेकिन उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।” ग्रामीणों का गुस्सा अब फूट पड़ा। अस्पताल में हंगामा शुरू हो गया—लोग चीख रहे थे, “नरेश स्वस्थ था, 108 में बैठा था, फिर सड़क पर घायल कैसे? क्या एम्बुलेंस में मारपीट हुई या उसे फेंक दिया गया?” यह सवाल न सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी को उजागर करते हैं, बल्कि आपात सेवाओं की जवाबदेही पर उंगली उठाते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि नरेश की मौत कोई साधारण घटना नहीं। रामेश्वर सवरा जैसे स्थानीय निवासियों का आरोप है, “दो मौतों के बाद तीसरी मौत—यह संदेहास्पद है। हम थाने और बीएमओ के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं।” क्या 108 संजीवनी एक्सप्रेस की प्रक्रियाओं में खामी है? या डॉयल-112 की टीम की कहानी में कोई छेद? जांच की मांग अब जोर पकड़ रही है, क्योंकि ग्रामीण न्याय की उम्मीद खो चुके हैं।

सिस्टम की कमजोरियां उजागर, जांच जरूरी: यह घटना धरमजयगढ़ जैसे ग्रामीण इलाकों में आपातकालीन सेवाओं की सच्चाई बयां करती है। जहां एक तरफ 108 एम्बुलेंस जीवन बचाने का माध्यम है, वहीं इस मामले ने उसकी विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया। जिला प्रशासन की चुप्पी ने आग में घी डाल दिया है। ग्रामीणों की मांग है कि सीसीटीवी फुटेज, एम्बुलेंस जीपीएस और गवाहों के बयानों से गहन जांच हो। क्या यह लापरवाही का नतीजा है, या कोई छिपी साजिश? सच्चाई सामने आए बिना, ऐसे हादसे दोहराते रहेंगे।

इस त्रासदी ने न केवल तीन परिवारों को तोड़ा, बल्कि पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया—आखिर असली जिम्मेदार कौन? पुलिस और स्वास्थ्य विभाग पर दबाव बढ़ रहा है कि इस रहस्य को सुलझाया जाए, वरना विश्वास की दरार और गहरी हो जाएगी।

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